कैलाश सत्यार्थी Exclusive Interview: नोबेल के लिए ट्रंप की बेचैनी और समाज में बच्चों की दुर्दशा पर रखे बेबाक विचार

हैदराबाद: आज की दुनिया एक जटिल बहु-ध्रुवीय व्यवस्था (multi-polar order) के दौर से गुजर रही है. एक ऐसी दुनिया जहां कमजोरों को डराने और चुप कराने के लिए आर्थिक निर्भरता को हथियार बनाया जा रहा है. ऐसे में क्या गरीबी, मानवीय पीड़ा, जलवायु परिवर्तन और सबसे महत्वपूर्ण- हमारे बच्चों की सुरक्षा और खुशहाली जैसे हाशिए पर धकेले जा चुके मुद्दों का कोई एक समाधान है?

इस सवाल का जवाब नोबेल पुरस्कार विजेता कैलाश सत्यार्थी से बेहतर कौन दे सकता है, जो शोषितों और बेजुबानों के लिए दुनिया की सबसे बुलंद आवाजों में से एक हैं. शुक्रवार को ईटीवी भारत के निसार धर्मा के साथ एक विशेष साक्षात्कार में, सत्यार्थी ने बताया कि उन्होंने इसी महीने रिलीज हुई अपनी नवीनतम पुस्तक ‘करुणा: द पावर ऑफ कम्पैशन’ में करुणा को एक नई परिभाषा देने की कोशिश की है.

बच्चों के अधिकारों के लिए लड़ने वाले इस वैश्विक नेता ने विस्तार से चर्चा की कि दुनिया वर्तमान में किन चुनौतियों से गुजर रही है और समस्याओं को सुलझाने के लिए एक वैकल्पिक दृष्टिकोण की आवश्यकता क्यों है?

सवालः आप अपनी नई किताब ‘करुणा: द पावर ऑफ़ कम्पैशन’ में कम्पैशन कोशेंट या CQ के बारे में बात करते हैं. CQ क्या है?

जवाबः दुनिया मुश्किल समस्याओं का सामना कर रही है. इतनी दौलत, ज्ञान और ताकत होने के बावजूद, लोग परेशान हैं. इन समस्याओं का टिकाऊ समाधान क्या हो सकता है? हालात यह हैं कि जब भी कोई समाधान मिलता है, तो उससे और ज़्यादा समस्याएं पैदा होने की संभावना भी होती है.

उदाहरण के लिए, लोग GDP बढ़ाकर गरीबी खत्म करने की बात करते हैं, फिर सारी पॉलिसी और प्रोग्राम उसी दिशा में चलते हैं. GDP का मतलब है ज़्यादा खपत, ज़्यादा प्रोडक्शन, जिसका मतलब है ज़्यादा इंडस्ट्रियलाइज़ेशन. जिसका मतलब है, धरती को नुकसान उठाना पड़ता है. मिनरल, पानी, हवा और ऐसे सभी रिसोर्स का इस्तेमाल इंडस्ट्रियलाइज़ेशन के लिए प्रोडक्शन और खपत बढ़ाने और GDP बढ़ाने के लिए किया जाता है.

मुझे एहसास हुआ कि करुणा ही इन सभी जटिल समस्याओं का समाधान है. मेरी करुणा की परिभाषा अलग है. यह दया, रहम या तरस खाना नहीं है. यह सहानुभूति (sympathy) या समानुभूति (empathy) भी नहीं है. लोग इन सभी शब्दों को एक ही टोकरी में डाल देते हैं. लेकिन मैंने करुणा की शक्ति को फिर से परिभाषित और पुनर्जीवित किया है. करुणा एक नरम भावना, या केवल एक मूल्य या गुण नहीं है.

करुणा वह शक्ति है जो दूसरों के दुख को अपना दुख महसूस करने से पैदा होती है. यह शक्ति इंसान को सोच-समझकर कदम उठाने के लिए प्रेरित करती है. सरल शब्दों में, करुणा ‘माइंडफुल प्रॉब्लम सॉल्विंग’ (सोच-समझकर समस्या का समाधान खोजना) है.

जब मैं करुणा भागफल (Compassion Quotient – CQ) की बात करता हूं, तो हमें यह समझना चाहिए कि हम सभी करुणा की जन्मजात शक्ति के साथ पैदा होते हैं. चेतना और करुणा दो दिव्य उपहार हैं. लेकिन पालन-पोषण, हमारी शिक्षा प्रणाली, सामाजिक-सांस्कृतिक और राजनीतिक माहौल सहित कई कारकों के कारण हम करुणा के रास्ते से भटक जाते हैं. हमने करुणा की उस शक्ति को खो दिया है जो बदलाव ला सकती थी.

चूंकि हर किसी के भीतर थोड़ी-बहुत करुणा होती है, इसलिए हम इसे माप सकते हैं और बढ़ा भी सकते हैं. यहीं पर ‘सीक्यू’ (CQ – Compassion Quotient) की भूमिका शुरू होती है. आईक्यू (IQ) और ईक्यू (EQ) बहुत व्यक्तिगत होते हैं, लेकिन सीक्यू ऐसा नहीं है. CQ चार घटकों से तय होता है और इन्हें मापा जा सकता है.

पहला घटक ‘जागरूकता’ (Awareness) है. दूसरों की समस्याओं और पीड़ा पर ध्यान देना. दूसरा ‘जुड़ाव’ (Connectedness) है. हमें एक-दूसरे से जुड़ा हुआ महसूस करना चाहिए क्योंकि मानव सभ्यता का पूरा विकास इसी भावना से प्रेरित है. लेकिन यह जुड़ाव सच्चा होना चाहिए. एक बार जब यह जुड़ाव बन जाता है, तो हम तीसरे घटक की ओर बढ़ते हैं, जो है ‘महसूस करना’ (Feeling).

यानी दूसरों की समस्याओं को अपनी समस्या के रूप में देखने का गहरा अहसास. और चौथा है ‘कार्रवाई’ (Action). जब आप पहले तीन घटकों को हासिल कर लेते हैं, तो वे एक शक्ति और एक क्रिया को जन्म देते हैं जो समस्या का समाधान बन जाती है.

करुणा एक शक्ति है, करुणा एक क्रिया है और करुणा ही समस्याओं का समाधान है. हमारे आसपास जो गलत और अन्याय हो रहा है, उस पर सवाल उठाने की जबरदस्त ताकत करुणा में है. साथ ही, करुणा उन सवालों के जवाब खोजने में भी मदद करती है. इसलिए सीक्यू (CQ) एक बिल्कुल नई अवधारणा है, लेकिन मुझे पूरा भरोसा है कि यह ‘गेमचेंजर’ साबित होगी. CQ को हम अपने जीवन के हर पहलू में लागू कर सकते हैं. चाहे वह जीवनसाथी चुनने का व्यक्तिगत फैसला हो, या कॉर्पोरेट जगत में किसी को नौकरी पर रखने का निर्णय. भविष्य में CQ ही सबसे निर्णायक कारक बनेगा.

सवालः आपकी नवीनतम पुस्तक ‘करुणा: द पावर ऑफ कम्पैशन’ आपकी आत्मकथा ‘दियासलाई’ से कैसे अलग है? इस नई किताब के पीछे क्या प्रेरणा थी?

जवाबः ‘दियासलाई’ में मेरे पूरे जीवन का लेखा-जोखा था, जिसमें मेरे संघर्ष, मेरी असफलताएं, मेरी सफलताएं और वो सब कुछ शामिल था जो मैं करुणा की शक्ति से हासिल कर सका. मुझे यह एहसास होने लगा कि यह सिर्फ मैं नहीं हूं, बल्कि ऐसे हजारों लोग हैं जिन्होंने समाज में बदलाव लाया. जिन्होंने न्याय, समानता, शांति और स्थिरता के लिए लड़ाई लड़ी. उनकी प्रेरक शक्ति भी करुणा ही रही है.

मेरा मानना है कि दुनिया के सभी धर्मों का जन्म करुणा की उसी चिंगारी से हुआ है. दुनिया के सभी धर्मगुरुओं ने आम जनता की पीड़ा को अपनी समस्या के रूप में महसूस किया और वे चुप नहीं बैठे. वे उस दुख से घबराए नहीं और न ही उन्होंने हार मानी. इसके बजाय, उन्होंने दूसरों के दुखों को दूर करने के लिए सोच-समझकर निर्णय लिया और कदम उठाए.

इसी तरह, सभी क्रांतियां और सामाजिक बदलाव करुणा की चिंगारी से ही पैदा हुए थे. मुझे लगा कि आज दुनिया को जिस चीज की सबसे ज्यादा जरूरत है, वह करुणा ही है. यही कारण था कि मैंने अपने और दूसरे लोगों के अनुभवों के आधार पर अपने कुछ विचारों को कलमबद्ध किया. मुझे यह भी एहसास हुआ कि अगर हम करुणा को इसकी पारंपरिक परिभाषा (दया या भलाई) के रूप में लेंगे, तो लोग इसे केवल एक अच्छा मानवीय गुण समझेंगे.

जबकि करुणा एक बदलाव लाने वाली, गतिशील और क्रांतिकारी शक्ति है. इसके बिना हम अन्याय की गहरी जड़ों को खत्म नहीं कर सकते. चाहे वह लैंगिक या नस्लीय भेदभाव हो, या फिर दुनिया भर में व्यवस्थित रूप से फैल रही नफरत और हिंसा. हमें ‘शक्ति और कार्रवाई’ के रूप में करुणा के इस नए विचार को अपनाना होगा. यह किताब इसी विचार को परिभाषित करती है.

साथ ही, मुझे लगता है कि आज ‘स्व-करुणा’ (Self Compassion) की भी बहुत जरूरत है. खासकर ऐसी दुनिया में जहां हर 6 में से 1 व्यक्ति तनाव या डिप्रेशन से जूझ रहा है. खुद के प्रति करुणा हमें अपने भीतर एक ‘बेस्ट फ्रेंड’ खोजने में मदद करती है, जो निष्पक्ष होकर हमारी समस्याओं को समझने और सुधारने में सहायक हो सकता है. इसके अलावा ‘स्वजन-करुणा’ (Kin Compassion) भी जरूरी है, जो आज की गलाकाट प्रतिस्पर्धा और गिरते पारिवारिक मूल्यों के दौर में हमारे परिवारों के साथ रिश्तों को बेहतर बनाने में मदद कर सकती है.

सवालः आज हम लगभग रोज़ देखते हैं कि कैसे ताकतवर देश छोटे देशों को डरा-धमका रहे हैं. क्या आपको लगता है कि ऐसी दुनिया में बड़े होने और इस तरह के व्यवहार को देखने से बच्चों की ‘करुणा’ की समझ पर असर पड़ेगा?

जवाबः दुनिया में अच्छे नेता हैं. धार्मिक संस्थानों में, राजनीति में और जीवन के हर क्षेत्र में अच्छे लोग मौजूद हैं. भले ही वे बहुत कम हैं, लेकिन वे निश्चित रूप से वहां हैं. पर उनकी आवाज उतनी बुलंद नहीं है. जैसा कि कहा जाता है कि बुराई बहुत तेज भागती है और सबसे ऊंचा बोलती है. दूसरी ओर, अच्छाई और गुण थोड़े धीमे और शांत हो सकते हैं. हमें ऐसे (अच्छे) नेताओं को खोजना होगा.

आप सही कह रहे हैं कि युवा पीढ़ी पर इसका बुरा असर पड़ रहा है. क्या यह शर्मनाक नहीं है कि दुनिया भर में 47.3 करोड़ से ज़्यादा बच्चे युद्ध या संघर्ष वाले इलाकों में रह रहे हैं? वे किसी भी युद्ध के लिए जिम्मेदार नहीं हैं, फिर भी वे सबसे ज़्यादा दुख झेल रहे हैं. गाजा में मारे जा रहे बच्चों का क्या कसूर है? कभी-कभी वे भूख से मर जाते हैं. खाना मौजूद है, लेकिन ट्रकों को रोक दिया जाता है. वे घायल होते हैं, बीमार पड़ते हैं, लेकिन उन तक दवाइयां नहीं पहुंचतीं. उनका क्या दोष है?

बड़ों की गलतियों की कीमत बच्चों को नहीं चुकानी चाहिए. वयस्कों को ‘करुणामयी कूटनीति’ (Compassionate Diplomacy) और बातचीत का रास्ता चुनना चाहिए. आज 13 करोड़ से अधिक बच्चे बाल श्रम और आधुनिक गुलामी की बेड़ियों में जकड़े हुए हैं. उनमें से कुछ को तो जानवरों की तरह खरीदा और बेचा जाता है, और उनकी कीमत एक जानवर से भी कम लगाई जाती है. यह किसका दोष है? यह हमारा दोष है. ये किसके बच्चे हैं? ये हमारे बच्चे हैं, ये आपके और मेरे बच्चे हैं.

जब तक हमारे भीतर करुणा और नैतिक जिम्मेदारी की भावना नहीं जागेगी, तब तक मुझे यह कहते हुए दुख हो रहा है- कोई भी योजना, कोई कानून या कोई प्रवचन इन बच्चों और उनके बचपन को नहीं बचा सकता. इसीलिए हमें ‘करुणा का वैश्वीकरण’ करना होगा. हमने बाजारों, अर्थव्यवस्थाओं, डेटा और सूचनाओं का वैश्वीकरण कर लिया है. यहां तक कि हमने कट्टरवाद और सांप्रदायिकता का भी वैश्वीकरण कर दिया है. लेकिन मेरा मानना है कि अब करुणा के वैश्वीकरण का समय आ गया है. अगर भारत और भारतीय, अपने इतने महान इतिहास के साथ, करुणा को दुनिया भर में फैलाने का नेतृत्व नहीं करेंगे, तो और कौन करेगा?

सवालः क्या आप ‘सत्यार्थी मूवमेंट फॉर ग्लोबल कम्पैशन’ (SMGC) पर कुछ रोशनी डाल सकते हैं? यह आपकी पिछली पहलों से किस तरह अलग है?

जवाबः यह नया आंदोलन, ‘सत्यार्थी मूवमेंट फॉर ग्लोबल कम्पैशन’, मेरे पिछले कार्यों और पिछले वर्षों में मैंने जो कुछ भी सीखा है, उस पर आधारित है. मुझे यह एहसास हुआ है कि हमारे पास एक टिकाऊ और समाधान-आधारित दृष्टिकोण होना चाहिए. बच्चों की समस्याओं को अलग-थलग करके हल नहीं किया जा सकता.

पिछले डेढ़ साल में SMGC (सत्यार्थी मूवमेंट फॉर ग्लोबल कम्पैशन) को व्यापक समर्थन मिला है. शांति और अन्य क्षेत्रों के कई नोबेल पुरस्कार विजेताओं, विश्व नेताओं और पूर्व राष्ट्राध्यक्षों ने इसे अपना जबरदस्त समर्थन दिया है. मुझे पूरा विश्वास है कि हमारी दुनिया वर्तमान की जटिल समस्याओं से निपटने के लिए एक वैकल्पिक रास्ता तलाश रही है.

लोग इस आंदोलन से जुड़ाव महसूस कर रहे हैं, यहां तक कि युवा भी. मैं हमेशा कहता हूं कि युवा जोश और करुणा दोनों से भरे होते हैं, जिसका उपयोग दुनिया को एक बेहतर जगह बनाने के लिए किया जा सकता है. मैंने विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में जहां कहीं भी करुणा की अपनी परिभाषा- यानी निस्वार्थ और सोच-समझकर समस्या का समाधान करना- के बारे में बात की, युवाओं ने उसे पसंद किया.

यह कोई धार्मिक अवधारणा नहीं है. करुणा धर्मनिरपेक्ष है. धार्मिक नेता और संस्थाएं शायद यह सोचती हैं कि वे करुणा का उपदेश दे रहे हैं और इतना ही काफी है. लेकिन उनके प्रयास तब तक खोखले रहेंगे जब तक वे उस करुणा को खुद न जिएं जिसका वे उपदेश देते हैं. केवल उपदेश देने से कोई समस्या हल नहीं होगी. करुणा न तो उपदेश है और न ही शिक्षा. मैं करुणा का कोई शिक्षक या उपदेशक नहीं हूं. मैंने इसे जीने का एक तरीका बना लिया है. पूरी विनम्रता के साथ मैं कहूंगा कि हर किसी के पास करुणा की शक्ति है, हमें बस उन परतों को हटाने की ज़रूरत है जिनसे हमने इसे ढक रखा है.

सवालः मैंने हाल ही में मानव तस्करी (ह्यूमन ट्रैफिकिंग) के खिलाफ लड़ने वाला एक और बड़ा नाम, सुनीता कृष्णन जी से बात की थी. उन्होंने कहा कि तकनीक ने तस्करों को पकड़ना और मुश्किल बना दिया है और यह अपराध अब ‘चेहराविहीन’ होता जा रहा है. क्या आप उनसे सहमत हैं? आप भारत में मानव तस्करी की समस्या को किस रूप में बदलते हुए देखते हैं?

जवाबः मुझे अपनी छोटी बहन, सुनीता कृष्णन जी के लिए बहुत सम्मान है. वह मानव गुलामी और तस्करी के खिलाफ लड़ने वाली सबसे बहादुर योद्धाओं में से एक हैं. मैं उनसे सहमत हूं. तस्करी एक संगठित अपराध है और इसमें कई ताकतें शामिल होती हैं. मानव तस्करी दुनिया के सबसे मुनाफे वाले अवैध व्यापारों में से एक है. अब यह मुद्दा सीमा पार का हो गया है. केवल आतंकवाद ही सीमा पार नहीं है. तकनीक ने तस्करी को आसान, आरामदायक और साथ ही अदृश्य बना दिया है. अदृश्य हाथ छोटे लड़कों और लड़कियों को उनके माता-पिता से छीन रहे हैं.

भारत में मानव तस्करों की रोकथाम, उन पर मुकदमा चलाने और उन्हें दोषी ठहराने के लिए बहुत काम किया जाना बाकी है, और इसके लिए तकनीक का व्यापक रूप से उपयोग किया जाना चाहिए. यह महत्वपूर्ण है कि तकनीक ऐसे बच्चों और महिलाओं के लिए एक रक्षक बने जो मानव गुलामी और तस्करी का शिकार हैं. तकनीक को केवल धन इकट्ठा करने का एक उपकरण बनकर नहीं रहना चाहिए. यह एक शक्तिशाली उपकरण बन सकती है, अगर यह उन लोगों के हाथों में हो जो सभी के लिए, विशेषकर बच्चों और समाज के अन्य कमजोर वर्गों के लिए स्वतंत्रता, गरिमा और न्याय में विश्वास करते हैं.

सवालः अमेरिकी राष्ट्रपति बार-बार यह मांग कर रहे हैं कि उन्हें उन सभी युद्धों के लिए नोबेल शांति पुरस्कार दिया जाना चाहिए जिन्हें उन्होंने “रोका” है. एक नोबेल विजेता होने के नाते, आप इसे कैसे देखते हैं? क्या इससे इस प्रतिष्ठित पुरस्कार की गरिमा कम होती है?

जवाबः यह एक मजेदार स्थिति है. मैं आपको बताऊं कि पिछले कुछ हफ्तों में, कई लोगों ने मुझे तब और ज्यादा जानना और सम्मान देना शुरू किया जब उन्हें पता चला कि एक भारतीय नोबेल शांति पुरस्कार विजेता है. लोगों ने नोबेल शांति पुरस्कार की अहमियत को समझा कि यह अमेरिका का राष्ट्रपति होने से भी बड़ा है, वरना वे (डोनाल्ड ट्रंप) इसके पीछे क्यों पड़ते. यह अन्य नोबेल विजेताओं के लिए अच्छा है.

हर कोई अच्छा काम कर सकता है और पुरस्कार पा सकता है, लेकिन यह अंतिम लक्ष्य नहीं होना चाहिए. जब मुझे यह पुरस्कार मिला, तो लोगों ने कहा कि मैं एक ‘सेलिब्रिटी’ बन गया हूं. शांति पुरस्कार पाने वाला पहला भारतीय मूल का भारतीय. मैंने उनसे कहा कि यह मेरे जीवन में केवल एक ‘अल्पविराम’ है. यह मुझे कोई विशेष या ‘खास आदमी’ नहीं बनाने वाला. मैं अपने उद्देश्य के लिए काम और संघर्ष जारी रखूंगा. मेरी इच्छा है कि राष्ट्रपति ट्रंप को नोबेल पुरस्कार मिले, लेकिन इसके लिए एक अलग दृष्टिकोण और एक अलग मानसिकता की आवश्यकता है. मैं उनके जीवन में सफलता की कामना करता हूं.

सवालः क्या आप 2004 की उस घटना को याद कर सकते हैं जब आपने पत्थर की खदान में तीसरी पीढ़ी की गुलाम ‘देवली’ और कई अन्य लोगों को बचाया था? जब उसने आपसे पूछा, ‘आप पहले क्यों नहीं आए?’ तब आपने कैसा महसूस किया था?

जवाबः उसने राजस्थानी बोली में ये शब्द कहे थे- ‘तू पहले क्यूं नहीं आयो’. जब उसने यह कहा, तो मुझे महसूस हुआ कि इंसान के तौर पर हम असफल हो गए हैं. अगर एक बच्चा भी खतरे में है, तो हम खुद को सभ्य कैसे कह सकते हैं? अगर एक लड़की भी गुलामी में है, तो हम कैसे कह सकते हैं कि दुनिया स्वतंत्र है या हम लोकतंत्र की बात कैसे कर सकते हैं?

मुझे तब पता चला था कि हरियाणा में एक अवैध पत्थर की खदान में कुछ परिवारों को बंधुआ मजदूर बनाकर रखा गया है. वह खदान एक बहुत ही शक्तिशाली राजनीतिक परिवार की थी, जिसका एक सदस्य सांसद था. जब हमने स्थानीय अधिकारियों से संपर्क करने की कोशिश की, तो कोई भी सरकारी अधिकारी मौके पर जाने को तैयार नहीं हुआ. उन्होंने पूरी तरह से इनकार कर दिया कि वहां कोई बंधुआ मजदूर है. इसलिए हमने अपने स्तर पर योजना बनाई, वहां की रेकी की और तय किया कि हम सुबह-सुबह उन परिवारों को वहां से छुड़ाएंगे.

हमें पता चला कि ऐसे बच्चे थे जो पत्थर की खदान पर पैदा हुए थे, उनके माता-पिता की शादी वहीं हुई थी, और उनके दादा-दादी को राजस्थान से हरियाणा में गुलाम बनाकर तस्करी की गई थी. तीन पीढ़ियां. यह बहुत जोखिम भरा और खतरनाक था. मैंने और मेरे दोस्तों ने सुबह जल्दी जाने का फैसला किया, यह जानते हुए कि खदान की रखवाली करने वाला बंदूकधारी तड़के वहां नहीं होगा. वह सुबह पास के गांव में फ्रेश होने के लिए जाता था. हम वहां गए और 50 से अधिक बच्चों, महिलाओं और पुरुषों को बचाने में कामयाब रहे. हम एक ट्रक और अपनी कार लाए थे. मैंने छोटे बच्चों, 6, 7 और 8 साल के बच्चों को अपनी कार में ले लिया. तेजी से गाड़ी चलाई क्योंकि मुझे उस इलाके से दूर जाना था वरना बात फैल जाती और हम मारे जा सकते थे.

ये सभी बच्चे सदमे में थे. मेरी कार के पीछे कुछ केले पड़े थे. पीछे बैठे बच्चे ने केलों के गुच्छे को छुआ, लेकिन उसे पता नहीं था कि इसका क्या करना है. उसने उसे दूसरे बच्चों को थमा दिया, जो आपस में बुदबुदाने लगे- ‘यह किस तरह का आलू है’? उन्होंने कभी केला देखा ही नहीं था. जब मैंने उनसे खाने को कहा, तो कुछ ने छिलके समेत खाने की कोशिश की और तुरंत थूक दिया. मुझे अपनी मूर्खता पर पछतावा हुआ कि मैंने उन्हें यह नहीं दिखाया कि इसे कैसे खाते हैं. कुछ ने खाया, कुछ ने नहीं. उन्होंने कभी किसी मीठी चीज़ का स्वाद नहीं चखा था. तभी अचानक, मुझे अपने कंधे पर एक भारी हाथ महसूस हुआ. वह हाथ इसलिए भारी था क्योंकि वह 8 साल की एक बच्ची का था, जिसे हर दिन हथौड़े से पत्थर तोड़ने के काम पर लगाया जाता था.

जब मैंने उसे देखा, तो उसके चेहरे पर एक साथ कई भावनाएं दिखाई दीं. अपनापन, गुस्सा, गहरा दुख और उम्मीदें. उसने पूछा- ‘क्यूं रे, तू पहले क्यूं नहीं आयो?’ उसने ऐसी चीजें देखी थीं जो किसी बच्चे को नहीं देखनी चाहिए. जब उसने मुझसे पूछा कि मैं पहले क्यों नहीं आया, तो मैं रोने लगा. यह केवल मुझसे पूछा गया सवाल नहीं था, बल्कि उन सभी के लिए एक चुनौती थी जो कानून और संविधान में विश्वास रखते हैं. यह उन सभी के लिए चुनौती थी जो किसी भी संत, पवित्र ग्रंथ या धर्म को मानते हैं. यह पूरी मानवता के लिए एक चुनौती थी- ‘तुम पहले क्यों नहीं आए? तुम्हें किसने रोका था?’

सवालः आपके कार्य ने दुनिया भर के व्यक्तियों और संगठनों को प्रेरित किया है. आप उन युवा कार्यकर्ताओं और बदलाव लाने वालों को क्या सलाह देंगे जो दुनिया में कुछ बदलाव लाना चाहते हैं?

जवाबः बस कृतज्ञ रहना सीखें. आप इसकी शुरुआत अपने माता-पिता, भाई-बहनों, पड़ोसियों और उन लोगों से कर सकते हैं जो आपकी मदद करते हैं. जैसे मजदूर, इलेक्ट्रीशियन, प्लंबर, कारीगर, वे लोग जो अनाज उगाते हैं ताकि हम जीवित रह सकें और वे जो हमारे कपड़े सिलते हैं. पहले अपने भीतर कृतज्ञता की भावना विकसित करें. यही भावना आगे चलकर नैतिक जिम्मेदारी का बोध कराएगी और अंततः ‘करुणा’ के माध्यम से कार्रवाई की ओर ले जाएगी.

अगर आप अपने आसपास के परिवेश से शुरुआत करते हैं, तो आप उन लोगों की तुलना में कहीं अधिक ‘सच्चे’ सामाजिक कार्यकर्ता बनेंगे जो सक्रियता को राजनीति में जाने या सत्ता हथियाने की सीढ़ी के रूप में इस्तेमाल करते हैं. मुझे लगता है कि हर अच्छा इंसान अपने आप में एक एक्टिविस्ट है.

सवालः क्या आपने कभी राजनीति में शामिल होने के बारे में सोचा है?

जवाबः हम में से कोई भी राजनीति से मुक्त नहीं है. हम या तो सक्रिय राजनीति में हैं या निष्क्रिय राजनीति में. मैं सक्रिय राजनीति में हूं. मेरी राजनीति अगले चुनाव, पद या सत्ता के लिए नहीं है. मेरी राजनीति अगली पीढ़ी और उसके बाद आने वाली पीढ़ियों के लिए है. राजनीति का उद्देश्य लोगों की सेवा करना और उन्हें न्याय दिलाना है. दुर्भाग्य से, इसने अपना अर्थ खो दिया है. अब राजनीति का मतलब केवल सत्ता की भूख रह गया है. मेरी राजनीति यह है कि हमें बच्चों के लिए, उनके बच्चों के लिए और फिर उनके बच्चों के लिए काम करना है, ताकि जब हम इस दुनिया से जाएं, तो हमें यह अहसास हो कि हमने दुनिया को पहले से थोड़ा बेहतर बनाया है.

सवालः बचपन में अपने स्कूल के बाहर एक मोची के बेटे को देखने से लेकर नोबेल पुरस्कार जीतने और आज तक के अपने सफर में, क्या कैलाश सत्यार्थी ने वह सब हासिल कर लिया है जो वे चाहते थे?

जवाबः अभी नहीं. मैं अपने लिए कभी कुछ हासिल नहीं करना चाहता था. लेकिन हां, दूसरों के लिए जो मैं हासिल करना चाहता था, वह अभी पूरा नहीं हुआ है. यह एक निरंतर चलने वाला संघर्ष है, एक जारी रहने वाली लड़ाई है. कुछ लोग सहमत होते हैं, कुछ समर्थन करते हैं, तो कुछ असहमत होकर विरोध भी करते हैं, लेकिन लड़ाई जारी है.

मेरे स्कूल का पहला दिन मेरी आंखें खोलने वाला था, जब मैंने अपनी ही उम्र के एक मोची के लड़के को स्कूल के ठीक बाहर बैठे देखा. मुझे बहुत निराशा हुई. मैंने अपने शिक्षक, माता-पिता और अन्य लोगों से इस बारे में पूछा. उन सभी ने मुझे यह समझाने की कोशिश की कि यह कोई असामान्य बात नहीं है, गरीब बच्चों को अपने परिवार की मदद करनी ही पड़ती है. मैं रोज उस बच्चे को खुले आसमान के नीचे काम करते देखता था, कभी अकेला तो कभी अपने पिता के साथ.

एक दिन मैंने हिम्मत जुटाई और उस लड़के और उसके पिता से इस बारे में पूछा. उसके पिता खड़े हुए, हाथ जोड़े और कहा कि उन्होंने और उनके पिता ने बचपन से ही काम करना शुरू कर दिया था और उनका बेटा भी वही कर रहा है. फिर उन्होंने कहा, “बाबूजी, आप लोग स्कूल जाने के लिए पैदा हुए हैं, लेकिन हम काम पर जाने के लिए पैदा हुए हैं.” यह एक चुनौतीपूर्ण विचार था जो जीवन भर मेरे साथ रहा. मुझे एहसास हुआ कि समाज में कुछ गलत है. भगवान इतना अन्यायी नहीं हो सकता. यह हम ही हैं जिन्होंने आपस में भेदभाव किया है. मैंने कुछ करने की एक तड़प महसूस की और वह आज भी जारी है.