करुणा भावना नहीं, एक ताकत…’, बेनेट यूनिवर्सिटी के ‘आलेख 2026’ में Gen Z से बोले कैलाश सत्यार्थी
नोबेल शांति पुरस्कार विजेता और बच्चों के अधिकारों के लिए अपने अथक संघर्ष के कारण विश्वभर में सम्मानित कैलाश सत्यार्थी ने 29 और 30 जनवरी को आयोजित बेनेट यूनिवर्सिटी के वार्षिक साहित्य महोत्सव ‘आलेख – द पावर ऑफ इंक’ की शोभा बढ़ाई।
सामाजिक न्याय और मानवाधिकारों के प्रति अपनी आजीवन प्रतिबद्धता के लिए जाने जाने वाले सत्यार्थी ने हजारों बच्चों को बाल श्रम और तस्करी के अंधेरे से मुक्त कराया है। बेनेट यूनिवर्सिटी में उपस्थित श्रोताओं को संबोधित करते हुए उन्होंने खुद को 72 वर्षीय Gen Z बताया और कहा कि आज की पीढ़ी पुरानी सोच के तरीकों पर सवाल उठाने और व्यवस्था में बदलाव लाने को तैयार है।
अपनी जीवन कथा साझा करते हुए सत्यार्थी ने बताया कि 15 वर्ष की उम्र में उन्होंने अपनी अपनी उच्च जाति की पारिवारिक पृष्ठभूमि के खिलाफ जाकर उन महिलाओं के लिए भोज आयोजित किया था, जो परंपरागत रूप से शौचालय साफ करने का काम करती थीं। इस कदम से न केवल उनका परिवार नाराज़ हुआ, बल्कि ब्राह्मण समुदाय ने सामाजिक बहिष्कार की धमकी दी। उन्होंने कहा, ”उसी समय मुझे हमारे समाज का पाखंड साफ दिखाई दिया- एक तरफ गांधीजी की जयंती मनाई जा रही थी तो दूसरी तरफ कोई भी नेता हरिजन महिलाओं के लिए आयोजित भोज में बैठने को तैयार नहीं था।”
इसी अनुभव के बाद उन्होंने अपनी जाति पहचान बताने वाला उपनाम छोड़ दिया और कैलाश शर्मा से कैलाश सत्यार्थी बन गए। सत्यार्थी जिसका मतलब- सत्य का विद्यार्थी होता है।
Gen Z छात्रों के साथ बातचीत में कैलाश सत्यार्थी ने अपनी नई पुस्तक ‘करुणा: द पावर ऑफ कंपैशन’ (Karuna: The Power of Compassion) के विचार साझा किए। उन्होंने कहा, ”करुणा कोई कोमल भावना नहीं है, यह एक शक्तिशाली बल है, जो साहस, जवाबदेही और कार्रवाई की मांग करता है।” उन्होंने छात्रों से अपील की कि वे सामाजिक दबावों में न बहें और दुनिया को करुणा की दृष्टि से देखें।
आलेख 2026 में दीप प्रज्वलन का औपचारिक शुभारंभ नोबेल शांति पुरस्कार विजेता एवं सत्यार्थी मूवमेंट के संस्थापक कैलाश सत्यार्थी तथा अशोक कुमार (आईपीएस, सेवानिवृत्त), हरियाणा खेल विश्वविद्यालय के कुलपति, द्वारा संयुक्त रूप से किया गया।
उन्होंने आगे कम्पैशन कोशेंट (Compassion Quotient यानी CQ) की अवधारणा पर भी जोर दिया और इसे IQ और EQ से अधिक महत्वपूर्ण बताया। बकौल सत्यार्थी, CQ न केवल व्यक्तिगत क्षमता को मापता है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि हम एक-दूसरे से किस तरह जुड़ते हैं।
डिजिटल युग पर सवाल उठाते हुए उन्होंने पूछा, ”क्या हम इस कनेक्टेड दुनिया में सच में जुड़े हुए हैं?” उन्होंने Gen Z और Gen Alpha को जीवन की दिशा तय करने में सहायक अपने तीन ‘D’ अपनाने का सुझाव दिया:
- Dream (सपना देखें)
- Discover (खोजें)
- Do (करें)।
सपना यानी समाज की समस्याओं के समाधान की कल्पना करना, खोज यानी समस्याओं की जड़ों को समझना, और करना यानी सही काम को आगे बढ़कर करना।
व्यक्तिवाद की बजाय एकता का आह्वान करते हुए उन्होंने कहा कि प्रगति तभी सार्थक है जब वह साझा हो। उन्होंने कहा, ‘हमें साथ चलना और हाथ थामना सीखना होगा’। उन्होंने आगे युवाओं से मानवता को एक परिवार के रूप में देखने तथा करुणामय, समावेशी वैश्विक भविष्य गढ़ने की अपील की। उन्होंने यह भी कहा कि जो कोई भी समाज की गलत परंपराओं पर सवाल उठाता है, वही असली Gen Z है, और चूंकि मैं आज भी सवाल उठाता हूं, इसलिए मैं खुद को भी Gen Z मानता हूं।
आलेख 2026 में अतिथि सम्मान के रूप में अशोक कुमार, IPS (सेवानिवृत्त), पूर्व डीजीपी उत्तराखंड और वर्तमान में हरियाणा स्पोर्ट्स यूनिवर्सिटी के कुलपति भी उपस्थित रहे। उन्होंने नेतृत्व और जीवन पर अपने विचार रखते हुए छात्रों से रुककर आत्ममंथन करने और अतीत से सीख लेकर अधिक सजग भविष्य गढ़ने की प्रेरणा दी।
कार्यक्रम में साहित्य की गहराई को और समृद्ध करते हुए लेखिका गीता हरिहरन और बेस्टसेलिंग लेखिका स्तुति चांगले ने From Page to Pulse सत्र में साहित्य को आत्मदर्पण के रूप में प्रस्तुत किया। इसके बाद कर्नल (डॉ.) अरुण कुमार वशिष्ठ ने ‘पत्थरों में लिखी कहानियों’ पर रोचक चर्चा करते हुए कालजयी कथाओं की स्थायी शक्ति को रेखांकित किया।
आलेख 2026 के दूसरे दिन की शुरुआत चिंतनशील कथाकार जितेंदर गिरधर, बहुमुखी लेखिका दीपिका चावला और अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त शोधकर्ता रमन बौंत्रा के सत्र से हुई, जिसमें पाठ्यपुस्तकों से परे जीवन दृष्टि पर चर्चा हुई।
इसके बाद यश तिवारी और पूर्व आईएएस अधिकारी विवेक अत्रेय ने ‘कर्तव्य’ विषय पर सत्र में चरित्र और मूल्यों के महत्व को रेखांकित किया। साहित्य उत्सव का समापन शौर्य चक्र से सम्मानित प्रवीण कुमार तेवतिया और युवा आइकन गुरमेहर कौर के प्रेरक सत्र के साथ हुआ, जहां साहस और दृढ़ विश्वास की वास्तविक कहानियों ने श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया।
अपने नाम के अनुरूप, आलेख एक ऐसा जीवंत मंच बनकर उभरा, जहां युवा आवाज़ों को सुना गया, महत्व दिया गया और प्रेरित किया गया। बेनेट यूनिवर्सिटी के लर्निंग रिसोर्स सेंटर, सेरेब्रुम क्लब और स्कूल ऑफ लिबरल आर्ट्स द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित इस दो-दिवसीय आयोजन में विचारकों, लेखकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और उभरते रचनाकारों का प्रतिष्ठित समूह एकत्रित हुआ, जिसने साहित्य की पहचान, समाज और राष्ट्रीय चेतना के निर्माण में उसकी अहम भूमिका को प्रभावशाली ढंग से रेखांकित किया।