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दिल अभी भरा नहीं....

किसी कॉलेज के कार्यक्रम में कोई वक्ता 30 मिनट के लिए बोलने को आए लेकिन सवा घंटे बोले, फिर भी श्रोता भाषण जारी रखने की मांग करते रहें। फिर अचानक बिजली चले जाने से हॉल में अंधेरा हो जाए तो छात्र इसलिए अपने मोबाइल की फ्लैश लाइट झटपट ऑन कर लें कि कहीं वक्ता अपना भाषण समाप्त न कर दें। आज के दौर में इस पर यकीन करना थोड़ा मुश्किल हो सकता है लेकिन 24 मार्च 2022 की शाम औरंगाबाद के तापड़िया नाट्यगृह में ऐसा ही नजारा देखने को मिला।

श्री कैलाश सत्यार्थी माणिकचंद पहाड़े लॉ कॉलेज के कानून के विद्यार्थियों, वकीलों और जजों की एक सभा को संबोधित करने आए थे। जाने-माने वकील स्व. विष्णुपंत वी. अद्वंत की स्मृति में यह कॉलेज लेक्चर सीरिज का आयोजन करता है। सत्यार्थीजी इसमें मुख्य अतिथि और वक्ता थे। कॉलेज की ओर से 2015 से ही सत्यार्थीजी के दफ्तर में इसके लिए लगातार अनुरोध भेजा जा रहा था। उनके दफ्तर में ऐसे तीन लाख से अधिक अनुरोध प्रतीक्षारत हैं लेकिन चूंकि सत्यार्थी जी का औरंगाबाद प्रवास हो रहा था तो उन्होंने कॉलेज का निमंत्रण स्वीकार लिया।

कार्यक्रम के तुरंत बाद सत्यार्थीजी को मुंबई की फ्लाइट पकड़नी थी, इसलिए उन्होंने कॉलेज को सिर्फ 30 मिनट का समय देने के वादा किया था। लेकिन सत्यार्थी जी जब भी अपने भाषण को समापन की ओर ले जाने की कोशिश करते, श्रोतागण और मंच पर बैठे गणमान्य लोग यह कहते हुए थोड़ा वक्त और देने की फरमाइश कर देते कि हमने इस दिन का आठ साल इंतजार किया है। श्रोताओं का वक्ता के साथ इस तरह का मनुहार चलता रहा और सत्यार्थीजी करीब सवा घंटे बोलते चले गए।

तभी बिजली चली गई। सत्यार्थी जी को लगा कि यह सही मौका है संबोधन को विराम देने का। उन्होंने मंच पर बैठे लोगों का अभिवादन करके इजाजत मांगी ही थी कि छात्रों ने अपने-अपने मोबाइल की फ्लैश लाइटें जला लीं। फ्लैशलाइटों के माध्यम से छात्रों ने बता दिया कि हमारा ‘दिल अभी भरा नहीं’। बिजली नहीं थी तो माइक चल नहीं रहा था। पूरे सभागार में एक स्वतःस्फूर्त शांति (पिन ड्रॉप साइलेंस) छा गई ताकि आखिरी सीट पर बैठे व्यक्ति तक भी सत्यार्थीजी की आवाज पहुंच सके।

पावर जेनरेटर चलने में पांच मिनट का वक्त लग गया। तब तक सत्यार्थी जी फ्लैश लाइट में ही बोलते रहे। जब लाइट आई तो सत्यार्थीजी ने यह कहते हुए अनुमति मांगी कि मुंबई की फ्लाइट छूट जाएगी। वहां भी एक कार्यक्रम है जहां बहुत से लोग इंतजार कर रहे हैं। मैं आपके बीच जल्द ही दोबारा आने की कोशिश करूंगा और बात को यहीं से आगे जारी रखेंगे।




आयोजक गदगद थे। उन्होंने इतना समय देने के लिए लिए सत्यार्थीजी का हृदय से आभार व्यक्त करते हुए कहा कि आज के विद्यार्थियों को जहां 15 मिनट का लेक्चर भी बोझिल लगता है वहीं कानून के छात्रों को एक ऐसे व्यक्ति को सवा घंटे से अधिक सुनने को आतुर देखना जो कानून के क्षेत्र से नहीं हैं, एक अभूतपूर्व अनुभव था। वक्ता के उद्बोधन के लिए इतना आकर्षण और ऐसा अनुशासन सभी प्रोफेसरों के लिए विस्मित करने वाला था।

लियो टॉलस्टॉय ने लिखा है कि भाषण एक कला है और अनुभव पर आधारित विचारों की अभिव्यक्ति सबसे गूढ़ कला क्योंकि इसमें निपुण व्यक्ति श्रोताओं के दिल में उतरकर उन्हें अपने वश में कर सकता है।

(यह लेख राजन प्रकाश ने लिखा है जो वहां मौजूद थे)

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